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सर्वहारा का महानायक लेनिन
- विनीत तिवारी
- 21 Jan, 2026
लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 को हुआ था। सत्रह बरस की उम्र में लेनिन कजान विश्वविद्यालय में भर्ती हुए थे जहाँ वे उन लोगों के संपर्क में आये थे जो मार्क्सवाद का अध्ययन समूह चलाते थे। चौबीस बरस की उम्र में वे सेंट पीटर्सबर्ग चले गए। वहाँ वे मजदूर संगठनों और क्रांतिकारी समूहों के संपर्क में आये, गतिविधियों में शरीक हुए, जेल गए, निर्वासन भोगा और 1905 के क्रांति के असफल प्रयास के बाद रूस लौट कर आये। बमुश्किल दो बरस रूस में रहने के बाद वे फिर रूस के बाहर चले गए और दस बरस बाद ही रूस लौटे जब क्रांति के हालात पककर तैयार हो गए थे। लेकिन रूस से दस बरस तक बाहर रहने के बाद भी उनका कोई भी दिन रूस में इंकलाब लाने के ख्याल से खाली नहीं जाता था। उन्होंने इस दरम्यान लिखकर अपने विचार लोगों के बीच पहुंचाए और तत्कालीन जार राज्य सत्ता की ताक़त के सामने जनवादी सर्वहारा की कतार तैयार कर दी। जब फ़रवरी 1917 में जार की सत्ता खत्म हुई तो उसकी जगह रूस में केरेन्सकी की सरकार बनी। केरेन्सकी की सरकार बेशक राजशाही नहीं थी लेकिन रूस के लोग जारशाही से मुक्ति को क्रांति मानकर खुश थे। ऐसे में लेनिन ने रूस के लोगों को अपने संदेश में कहा कि केरेन्सकी की सरकार रूस के पूँजीपति वर्ग के हितों को साधने वाली सरकार ही थी। लेनिन ने ग्रामीण कृषकों के समुदायों के संगठन बनाये और क्रांतिकारी शक्तियों का विकेन्द्रीकरण किया। पूँजीपति सरकार के जनविरोधी चेहरे को लगातार उजागर करते हुए आखिरकार 7 नवंबर 1917 को केरेन्सकी की सरकार को भी हटा दिया और सर्वहारा क्रांति को अंजाम देकर सर्वहारा की सरकार क़ायम की।
क्रांति के बाद लेनिन अधिक समय जीवित नहीं रहे। सन 1924 की 21 जनवरी को उनका निधन हो गया था। लेकिन 1917 से 1922 तक उन्होंने रूस को एक प्रगतिशील समाज बनाने के लिए अनथक प्रयत्न किये। सबसे पहले स्त्रियों को समाज में बराबरी के स्तर पर लाने, उन्हें सशक्त करने, पड़ोसी देशों के साथ युद्ध बंद कर शांति स्थापित करने और देश की जनता के लिए शासकीय स्तर पर अच्छी चिकित्सा, आवास, शिक्षा उपलब्ध कराने और सबसे बढ़कर हर इंसान को सम्मानजनक रोजगायर प्रदान करने वाली नीतियों की नींव डाली। उस ढाँचे पर खाद्य हुआ सोवियत संघ सत्तर वर्षों से ज्यादा समय तक क़ायम रहा और उसने दुनिया के सामने यह मिसाल क़ायम की कि मेहनतकक्ष मनुष्य भी सरकार चला सकते हैं और सभी के लिए बराबरी के अवसरों वाली दुनिया मुमकिन है। भले ही सोवियत संघ 1991 में बिखर गया हो, लेकिन लेनिन को रूस की और दुनिया की मेहनतकश जनता आज भी अपना महानायक मानती है। आज उनके अवसान दिवस पर दुनिया के मजदूरों और किसानों को एक होने का नारा देने वाले लेनिन को श्रद्धांजलि।
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Md Wadud Hossain
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